पत्थर हूं मैं, जड़ हूं मैं ।
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पत्थर हूं मैं, जड़ हूं मैं ।
लम्बवत धरती में गड़ा हुआ ।
आँधी तुफ़ानो में, समन्दर के ऊफ़ानो में,
बन के ढीट खडा हुआ ।
पत्थर हूं मैं, जड़ हूं मैं ।
फिर भी, नाव कई किनारे कर गया ।
चीर कर छैनी से मेरे तन को,
देखो कर्म मुझे ले गया ।
बना चौकोर मुझे, मुझ पर ही तह गया ।
अधर में लटका हुआ, न धरती मेरी, न गगन अपना ।
पत्थर हूं मैं, जड़ हूं मैं ।
फिर भी, सीड़ी स्वर्ग मैं एक और चढ गया ।
अरे देखो, अरे रोको इसे कोई ।
ये कौन उठा ले चला मुझे, कहाँ ।
सुनसान, अनजान, बिय़ाबाँ में गाढ़ मुझे,
मील पत्थर मुझे कह गया ।
पत्थर हूं मैं, जड़ हूं मैं ।
फिर भी, मंजिले कई तय कर गया ।
अचल, अडिग, अभिमानी ऊँचा शीश मेरा ।
चूर हुआ - बूर हुआ ।
मचा हड़कंप ऐसा, हुआ अंग-भंग मेरा ।
टूटता गिरता जा डूबा धारा में ।
पत्थर हूं मैं, जड़ हूं मैं ।
फिर भी, संग समय प्रवाह के बह गया ।
उलटता पलटता ठोकरें खाता,
खोकर स्वच्छंदत्ता अपनी, आकार नया पा गया ।
अब गोल हूं, सुडौल हूं मैं ।
उठा तल से, हो गया स्थापित
बन पिण्डी, देहरे की भिति में ।
पत्थर हूं मैं, जड़ हूं मैं ।
फिर भी, स्थान अराध्य का पा गया ।
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Sunday, September 7, 2008
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